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देखिए बड़ा खुलासा- एड्स कंट्रोल करने के नाम पर गोरखधंधा, आदिवासी महिलाओं को बनाया जा रहा है सेक्स वर्कर!

रायपुर- जयदेव सिंह

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रायपुर। छत्तीसगढ़ एड्स कंट्रोल सोसाइटी के अधिनस्थ लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना (T.I.) प्रोजेक्ट और महासमुंद जिला मुख्यालय में संचालित जन जागृति केन्द्र (NGO) का घिनौना कारनामा सामने आया है।  टॉरगेट पूरा करने और चंद रुपयों की खातिर भोली भाली ग्रामीण आदिवासी महिलाओं को सैक्स वर्कर बताने, गोपनीयता की आड़ में यह गंदा और घिनौना खेल खेला जा रहा है। इस साजिश में मैदानी अमला सहित पूरा एड्स कंट्रोल सोसायटी के आला अफसर भी सामिल है। इस बात से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि महासमुंद में संचालित एक NGO ऐसे कृत्य को अंजाम दे रहे हैं तो प्रदेश भर में T.I. प्रोजेक्ट द्वारा कुल 37 NGO के जरिए इस काम को किया जा रहा है। ऐसे NGO के मैदानी स्तर पर किए जा रहे कार्य पर उंगलियां उठना लाजिमी है।                                    आदिवासी महिलाओं को बता दिया गया सेक्स वर्कर- इस एनजीओ द्वारा महिला यौन कर्मियों का एड्स जैसी खतरनाक बीमारी से बचाने के काम किया जाना है लेकिन भोली भाली आदिवासी महिलाओं को यौन कर्मी (FSW) बताते हुए उन महिलाओं का आईटीसीटी केन्द्र ले जाकर महिलाओं की जांच कराया गया है। उल्लेखनीय है कि उन महिलाओं को यह तक नहीं पता कि सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड में उनकी क्या पहचान है? जनजागृति केन्द्र के पीडी मंजू गाडियां, पीएम मुरारी चंद्रा और ओआरडब्लू राधा, पीयर ऐजूकेट्रस ज्योति सहित सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों तथा कर्मचारियों की मिली भगत से इस घिनौना काम को अंजाम दिया जा रहा है।

NGO के घिनौने खेल में कौन-कौन है शामिल?
महासमुंद से महज 8 किलोमीटर दूर पर स्थित तुमगांव नगर पंचायत के वार्ड नं 15, गाड़ाघाट का मामला सामने आया है। सिर्फ टारगेट पूरा करने के लिए यहां के गरीब आदिवासी महिलाओं का (HIV AIDS) की जांच करवाई गई है। जबकि T.I. प्रोजेक्ट का काम महिला योन कर्मी (F.S.W.) को लेकर अस्पताल में जांच कराना है। आपको यह जानना जरूरी है कि नाको द्वारा सालाना करोड़ों रुपए छत्तीसगढ़ एड्स कंट्रोल सोसायटी को दिया जाता है कि एड्स जैसी बीमारियों के प्रति लोगों में जागरूकता लाना और महिला योन कर्मियों को इसके बचाव के लिए दवा, कंडोम आदि मुहैया कराया जाना है। लेकिन गोपनीयता और टॉरगेट पूरा करने की आड़ में चंद रुपयों की खातिर ग्रामीण क्षेत्र की घरेलू आदिवासी महिलाओं को सैक्स वर्कर (F.S.W.) बना दिया है। एड्स कंट्रोल सोसायटी के अतर्गत संचालित लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना (T.I.) प्रोजेक्ट को भी अच्छी खासी राशि दी जाती है। लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना द्वारा महासमुंद स्थित जन जागृति केन्द्र को क्षेत्रों में कार्यरत महिला योन कर्मियों को एड्स जैसी खतरनाक बीमारी से बचाव एवं जागरूकता के साथ पहचान कर इलाज और दवा उपलब्ध कराना है। जन जागृति केन्द्र के ओआरडब्लू और पीयर्स ऐजूकेट्रस की नैतिक जिम्मेदारी है कि महिला यौन कर्मियों (फिमेल सैक्स वर्कर) को पूरी जानकारी के साथ जिला अस्पताल में संचालित (I.T.C.T.) सेंटर ले जाकर HIV AIDS और वेनेरिअल डीसीस रिसर्च लेबोरेट्री गुप्त रोग (VDRL) की जांच कराई जाए। उक्त महिला को एड्स जैसी बीमारी का लक्षण तो नहीं है, ऐसे महिलाओं को कोई भी संक्रमण ना हो, इसके लिए सरकारी अस्पताल में यौन कर्मी महिलाओं का बाकायदा आईटीसीटी सेंटर पर कॉउंसलिंग भी किया जाता है। क्या इन आदिवासी महिलाओं की कॉउंसलिंग किया गया था अगर कॉउंसलिंग किया गया था तो फिर आदिवासी महिलाओं को HIV-AIDS जैसे खतरनाक रोग के संबंध में कोई भी जानकारी क्यों नहीं दी गई? बता दें कि अगस्त माह में इन एक दर्जन आदिवासी महिलाओं के साथ यशोदा बाई ध्रुव 65 वर्षीय (परिवर्तित नाम) को भी नयापारा उप स्वास्थ्य केन्द्र लेकर गए थे। किन्तु अधिक उम्र होने के कारण ब्लड सेंपल नहीं लिया गया। साधारण उपचार दी गई। इसकी शिकायत ITCT सेंटर तक जा पहुंची। जानकारी के अनुसार इस सेंटर से जन जागृति केन्द्र के प्रोजेक्ट मैनेजर मुरारी चंद्रा को सूचना दी गई थी लेकिन प्रोजेक्ट मैनेजर ने पूरे मामले को रफादफा करने में लगे रहे।

एनजीओ चंद रुपयों की खातिर खेल रहे हैं घिनौना खेल

महासमुंद जिले में यह काम जनजागृति केन्द्र नामक (NGO) को दिया गया है। इस प्रोजेक्ट के डायरेक्टर हैं मंजू गाडियां जो कि पिथौरा ब्लॉक के लाखागढ़ में रहती है। इसके चलते प्रोजेक्ट मैनेजर मुरारी चंद्रा टॉरगेट पूरा करने के लिए ओआरडब्लू और पीयरों पर दबाव बनाया जाता हैं, और पीयर्स इस दबाव में गांव-गांव जाकर मनमाने ढंग से आदिवासी घरेलू महिलाओं को महिला योन कर्मी बताकर आईटीसीटी सेंटर तक पहुंचाने का काम किया जा रहा है। लक्षय गत हस्तक्षेप परियोजना के उद्देश्य को ही बदल कर रख दिया है। एक ही गांव की 1 दर्जन आदिवासी महिलाओं को सर्दी, खांसी, टीवी, कमजोरी, हाथी पैर (फायलेरिया) जैसे रोग का इलाज और दवा दिलाने झूठ बोलकर जिला अस्पताल और नयापारा स्थित उप स्वास्थ्य केन्द्र ले जा कर एड्स की जांच कर वायी गई। उन महिलाओं को यह जानकारी तक नहीं है कि उनका ब्लड सेंपल क्यों और किसलिए लिया गया है। जबकि नयापारा उप स्वास्थ्य केन्द्र में सिर्फ HIV की ही जांच होती है। लेकिन जिला अस्पताल में HIV AIDS के साथ वेनेरिअल डीसीस रिसर्च लेबोरेट्री गुप्त रोग (VDRL) जांच की सुविधा उपलब्ध है, और महिलाओं का कॉउंसलिंग भी किया जाता है। संस्था के पीयरों ने जानबूझकर आदिवासी महिलाओं को उप स्वास्थ्य केन्द्र लेकर गए। जनजागृति केन्द्र द्वारा भोली भाली आदिवासी महिलाओं की गिंती फिमेल सैक्स वर्कर (F.S.W.) के रूप में दर्ज करा दिया गया। एड्स कंट्रोल सोसायटी सहित पूरा स्वास्थ्य विभाग इन महिलाओं की जानकारी गोपनीय रखा जाता है। शायद इसलिए घरेलू आदिवासी महिलाओं को टॉरगेट पूरा करने के लिए I.T.C.T. सेंटर तक पहुंचाने में कामयाब हो रहे हैं। इन संस्थाओं को पता है किसी महिला की जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाता। गौरतलब है कि अचानक ही ग्रामीण क्षेत्रों में सैक्स वर्करों की तादाद कैसे बढ़ गई है, क्या जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग के आला अफसरों को इस बात की भनक तक नहीं है कि जिला मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गाड़ाघाट के महिलाएं सैक्स वर्कर है, या फिर प्रोजेक्ट डायरेक्टर और प्रोजेक्ट मैनेजर की सोची समझी साजिश के तहत इस कृत्य को अंजाम दिया गया है। मानते हैं कि एड्स जैसी खतरनाक बीमारी से लोगों का बचाव करना जरूरी है लेकिन किस किमत पर नीजि स्वार्थों के लिए किसी भी महिलाओं को सरकारी रिकॉर्ड में वैश्या बता देना घोर अपराध है।                              तुमगांव नगर पंचायत अध्यक्ष मीना शर्मा का कहना है वार्ड 15, की महिलाएं ऐसे कार्य में संलिप्त नहीं है। संस्था द्वारा गरीब आदिवासी महिलाओं का अपमान किया गया है। जो हमें कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जन जागृति संस्था के खिलाफ थाने में FIR की जाएगी।

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अफसरों के वर्जन

अतिरिक्त परियोजना संचालक डॉ. एस. के. बिंझवार का कहना है कि ”अगर घरेलू आदिवासी महिलाओं को लेजाकर HIV- AIDS जांच कराई गई है तो गलत है। लिखित शिकायत मिलने पर जांच कराई जाएगी।”

T.I. प्रोजेक्ट के डिप्टी डायरेक्टर विक्रांत वर्मा का तर्क कुछ और ही है। वर्मा ऑन रिकॉर्ड कहा कि छत्तीसगढ़ में खुले तौर पर धंधा नहीं करते। बल्कि यहां छुपे तौर पर आदिवासी महिलाएं धंधा करती है। वर्मा का कहना है छत्तीसगढ़ में होम बेस्ड फिमेल सैक्स वर्कर अधिक पाई जाती है, और ऐसी महिलाओं का जांच कराना है।

T.I. प्रोजेक्ट के नोडल अधिकारी डॉ. एन. के. मंडपे ने कहा कि जन जागृति केन्द्र में कार्यरत कर्मचारी महिलाओं को लेकर आते हैं। उन महिलाओं की HIV AIDS और VDRL की जांच कराया जाता है। महिलाएं सैक्स वर्कर (FSW) है या नहीं कॉउंसलर ही बता पाएगा।

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