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समाजसेवा की मिसाल बनीं रीता अग्रवाल

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वो कहते हैं न कि डर के आगे जीत है, जिन्होंने संघर्षों को जीत लिया समझ लो वही असली बादशाह कहलाने का हकदार है जी हां आज हम आपको ऐसी ही प्रतिभाओं की धनी साहस की मूर्ति जिसने हर परिस्थिति में रहकर कभी अपना आत्मविश्वास नहीं खोया। जिन्होंने अपनी शारीरिक अपंगता को अपने सपनों पर कभी हाबी नहीं होने दिया, और यहीं वजह है कि आज वो पूरे सरगुजा क्षेत्र की महिलाओं के लिए आदर्श बनीं हुईं है। हम बात कर रहे हैं रीता अग्रवाल की। जो एक सामान्य परिवार में जन्मी ऐसी महिला हैं,जिन्होंने समाज के भेदभाव को झेलते हुए भी हार नही मानी। रीता जी जन्म से ही दिव्यांग हैं,जन्म से उनका एक हांथ पूरा नही है जिसके कारण बचपन से ही उनको समाज मे भेदभाव के तराजू पर तौला गया है।

एक सामान्य परिवार जिनमे उनके माता-पिता और कुल 6 भाई-बहनों में रीता जी 3रे स्थान पर जन्मी, जन्म से दिव्यांग होने के बावजूद रीता जी को परिवार का हर पल पूरा सहयोग मिलता रहा है उनको परिवार से कभी किसी भी सदस्य से ऐसी प्रतिक्रिया नही मिली जिससे उनके साथ कोई भेदभाव का एहसास हो। माता-पिता अपनी बाकी सभी संतानों की तरह रीता को भी उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए समाज के एक प्रतिष्ठित संस्थान सरस्वती शिशु मंदिर में दाखिला करवाया, लेकिन यहां रीता जी को बाकी विद्याथियों की तरह बर्ताव नही मिलता रीता पर किसी भी शिक्षक का जरा भी ध्यान नही रहता कोई भी छात्र रीता के साथ नही खेलता क्योंकि उनका एक हांथ दूसरों की तरह पूरा नही था,इस बात से रीता को हमेशा भेदभाव झेलना पड़ता।

जब रीता 9वीं कक्षा से मिशनरी संस्थान के हॉली क्रॉस कान्वेंट स्कूल में दाखिल हुईं तो यहां उनके आत्मविश्वाश में वृद्धि हुई जहां पिछले स्कूल में उनका कोई भी मित्र नही था, अब यहां रीता को नए मित्र मिल गए उनकी पढ़ाई पर भी शिक्षक बराबर ध्यान रखते जिसके फलस्वरूप रीता जी ने इसी संस्थान से अपनी कॉलेज की शिक्षा भी यहीं से पूर्ण की। और भूगोलशास्त्र से p.g. भी किया, इसके बाद नॉकरी के लिए कई प्राइवेट कंपनियों में इंटरवियूव दिया मगर दिव्यांग होने के कारण यहां भी निराशा ही हांथ लगी। जिसके कारण हॉली क्रॉस संस्थान में ही उन्होंने एक वर्ष तक असिस्टेंट लैब लाइब्रेरियन के पद पर कार्य किया, साथ ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने भी लगी मगर यहां भी एक वर्ष से ज्यादा नही पढ़ा सकीं, तो रीता ने सोचा कि छोटे बच्चों के स्कूल में सम्पर्क किया जाए और रीता एक प्राइवेट स्कूल में साक्षात्कार के लिए पहुंच गई और प्राचार्य से इनका साक्षात्कार प्रारम्भ हुआ और प्राचार्य के एक सवाल ने रीता को इतना आघात पहुंचाया की वो खुद को एकदम से असहाय महसूस करने लगीं। प्राचार्य ने रीता से कहा कि तुम खुद अपना कार्य ठीक से नही कर पाती हो तो यहां छोटे-छोटे बच्चों को कैसे संभालोगी..?

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रीता मानसिक रूप से काफी परेशान हो गईं और कभी भी किसी प्राइवेट संस्थान में नौकरी नही करने का निर्णय लिया। और इस घटना के बाद रीता घर से ज्यादा बाहर नही जातीं फिर कुछ सालों के बाद एकदिन घर पर ही किसी कार्यक्रम में रीता की मुलाकात शहर की एक महिला वंदना दत्ता जी से हुई और इस मुलाकात से रीता के आत्मविश्वास में वृद्धि हुई और रीता, वंदना दत्ता जी के वसुधा महिला मंच नामक संस्था से जुड़ कर कार्य करने लगीं कहीं ना कहीं  रीता को वंदना जी से प्रेरणा मिलती ही रहती और आत्मविश्वास के साथ संस्था की सक्रिय सदस्य हो गईं।  दिसम्बर 2014 में तात्कालीन जिलाधीश श्रीमती ऋतु सेन जी से समाज सेवा में मदद के लिए सम्पर्क भी की,यहां कलेक्टर मैडम से हुई मुलाकात ने तो मानो रीता की जिंदगी ही बदल दी।

जब कलेक्टर मैडम से रीता ने समाज सेवा के कार्य मे मदद मांगी तो उन्होंने रीता से कहा कि अपने परिवार की मदद से वो बुटीक का व्यवसाय करें। अब रीता का परिवार शहर के  समृद्ध परिवारों में से एक था,रीता को लगा कि मैडम उनकी बात नही समझ पा रहीं है तो उनका ध्यान समाज सेवा कार्य पर केंद्रित करने की कोशिश की मगर मैडम के सकारात्म प्रतिक्रिया नही मिलने के कारण खुद से यह प्रण लिया की अब कुछ भी हो जाये उनकी यह जिंदगी दिव्यांगों के ही नाम समर्पित है,और अपना कार्य जिला अस्पताल से प्रारम्भ किया क्योंकि यहां रीता  खुद ही भेदभाव का शिकार हुईं थी,विकलांग प्रमाण पत्र बनवाने हेतु दिव्यांगों की मदद करने वाला जिला अस्पताल में कोई भी नही था और नाही दिव्यांगों के लिए पर्याप्त सुविधा। जिला अस्पताल में कार्य के दौरान रीता दिव्यांगों के विद्यालय भी जाने लगीं उनके साथ समय व्यतीत करने लगीं क्योंकि उनको मालूम था अगर ऐसी हालत में कोई मित्र नही हो तो कैसा महूसूस होता है। दिव्यांग बच्चों के साथ रीता खेलतीं उनका पूरा ध्यान रखतीं। अब रीता के समाज सेवा के कार्य को एक बेहतरीन रूप मिलने लगा, और समाज सेवा की भावना और भी गहरी होती गई।गांव के दिव्यांग बच्चो को शिवरों में रीता जी ने कंप्यूटर स्किल मैनेजमेन्ट की ट्रेनिग भी दिलवाई जिससे उन बच्चों में एक नया उत्साह देख रीता का भी आत्मविश्वास बढ़ता, एक शिविर में किसी बच्चे ने रीता जी कहा कि इस शिविर के बाद उनकी जिंदगी तो फिर उसी नरक रूपी समाज मे चली जायेगी रीता जी इस बात से काफी प्रभावित हुईं और निर्णय लिया कि दिव्यांग के विकास के लिए पूरा जीवन समर्पित है। फलस्वरूप रीता जी ने एक होस्टल का निर्माण किया जिसका नाम कलावती पुनर्वास केंद्र है। और यहां दिव्यांग बच्चों  की सेवा में कूद पड़ी।

वर्तमान में उनके होस्टल में 20 बच्चे हैं और रीता अपने इन प्रयास से कई उपलब्धियां भी हासिल कर चुकीं हैं,जिनमे  वर्ष 2016 में राजस्थान के चित्तौड़ में आयोजित एक कार्यक्रम में उनका सम्मान डॉक्टर भीमराव आंबेडकर प्राइड आफ दी कंट्री के अवार्ड से सम्मानित किया गया,यहां पूरे छत्तीसगढ़ से एकमात्र रीता अग्रवाल को सोशल मीडिया के माध्यम से आमंत्रित किया गया।

 

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